"जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें गति और शक्ति न पैदा हो, हमारा सौंदर्य प्रेम न जागृत हो, जो हममें संकल्प और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह हमारे लिए बेकार है वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं है।"

- मुंशी प्रेमचंद

सालों बाद जून की कोई गर्म दुपहरी उसी नीम के नीचे कोई ख़याल कागज़ पर उतरा और सिलसिला चल पड़ा…..फिर कभी इंडियन कॉफी हाउस के पेपर नेपकीन पर तो कभी केमिस्ट्री की फाइल में जमा होते गए लमहे … मटका कुल्फी वाली गर्मियों की रातें, आँगन में अलाव सेंकती सुबहें और छज्जे से टपकता सलेटी दिन… यूकेलिप्टस वाले मकान का वो मोड़ भी जहाँ से यादें लिफ्ट ले लेती हैं…कंदील से बतियाता चाँद ,गिफ्ट वाला कड़ा, तकिया टापू की मन्नतें और पटेल ग्राउंड पर लेग बिफोर होता बचपन….. गले गले भर गया गुल्लक तो सोचा तुड़वा लें ऍफ़ डी… खोलकर देखा तो ज़िन्दगी `बारह आने की पड़ीं….अठन्नी में चवन्नी ज़्यादा और रुपये में चवन्नी कम…

– सुधीर शर्मा

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If you wish to make an apple pie from scratch, you must first invent the universe.

Far far away, behind the word mountains, far from the countries Vokalia and Consonantia, there live the blind texts. Separated they live in Bookmarksgrove right at the coast of the Semantics, a large language ocean.

Even the all-powerful Pointing has no control about the blind texts it is an almost unorthographic life One day however a small line of blind text by the name of Lorem Ipsum decided to leave for the far World of Grammar.

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मुंशी प्रेमचंद

चापलूसी का ज़हरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुँचा सकता जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी न जाएँ।

रबीन्द्रनाथ ठाकुर

सिर्फ तर्क करने वाला दिमाग एक ऐसे चाक़ू की तरह है जिसमे सिर्फ ब्लेड है। यह इसका प्रयोग करने वाले को घायल कर देता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

यदि गद्य कवियों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है. भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबंधों में ही सबसे अधिक संभव होता है.

गेब्रियल गार्सिया मार्केज़

अंततः, साहित्य कुछ भी नहीं सिर्फ बढ़ईगीरी है। दोनों के साथ आप वास्तविकता के साथ काम कर रहे हो,  एक सामग्री के साथ जो लकड़ी की तरह सख्त है।


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