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शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती

By February 25, 2018 0

तुम उपस्थित हो
मेरे ठीक सामने
देख पा रही हूं तुम्हारे होठों का हिलना
शब्द कानों तक नहीं पहुंच रहे

मेरी गर्दन पर आकर बैठ गई है
अकेलेपन की महसूसियत
जो अब भीतर उतरती जाती है
वह मेरे साथ अधिक है
तुम से भी अधिक

दुख के लम्बे क्षणों के अन्तराल में
वह ठिठक कर आता रहा है मेरे समीप
और अब मेरे निकट यूं रहना
उसका स्वभाव हो चला है
एक बुरा – सा स्वभाव

मैं देख सकती हूं
तुम्हारे चेहरे की परिचित बनावट
शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती
हम एक अजीब समय खण्ड में आ पहुचे हैं
जहां एक दूसरे को पहचानना भूलता जाता है
बीच के किसी रिक्त बिन्दु पर जगह पाकर
पसर गया है अकेलापन
जरा देर के लिए गौर से सुनो
तुम उसे सुन सकते हो मेरे मौन में!


निवेदिता

निवेदिता

राजस्थान पत्रिका, दूरदर्शन और अन्य संस्थानों के लिए लघु अवधि तक कार्य करने के उपरान्त स्वतंत्र लेखन।