POETRY

शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती

तुम उपस्थित हो
मेरे ठीक सामने
देख पा रही हूं तुम्हारे होठों का हिलना
शब्द कानों तक नहीं पहुंच रहे

मेरी गर्दन पर आकर बैठ गई है
अकेलेपन की महसूसियत
जो अब भीतर उतरती जाती है
वह मेरे साथ अधिक है
तुम से भी अधिक

दुख के लम्बे क्षणों के अन्तराल में
वह ठिठक कर आता रहा है मेरे समीप
और अब मेरे निकट यूं रहना
उसका स्वभाव हो चला है
एक बुरा – सा स्वभाव

मैं देख सकती हूं
तुम्हारे चेहरे की परिचित बनावट
शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती
हम एक अजीब समय खण्ड में आ पहुचे हैं
जहां एक दूसरे को पहचानना भूलता जाता है
बीच के किसी रिक्त बिन्दु पर जगह पाकर
पसर गया है अकेलापन
जरा देर के लिए गौर से सुनो
तुम उसे सुन सकते हो मेरे मौन में!


निवेदिता

निवेदिता

राजस्थान पत्रिका, दूरदर्शन और अन्य संस्थानों के लिए लघु अवधि तक कार्य करने के उपरान्त स्वतंत्र लेखन।

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