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सताने को मुझे कुछ इस कदर बेताब है ये दिल

सताने को मुझे कुछ इस कदर बेताब है ये दिल
सताने को मुझे कुछ इस कदर बेताब है ये दिल,
निगाहें उनकी चिलमन पर लगाए आज बैठा है…
उम्मीदों के परों पे आसमान में उड़ रहा पंछी,
तेरी राहों पे वो पलकें बिछाये आज बैठा है…
उसी के तीर हैं दिल पर, वही हमदर्द है मेरा,
कि ज़ख्मों पर मेरे मरहम लगाए आज बैठा है…
मोहब्बत क्या है, मेरे दिल से ये ना पूछो,
कि सूने घर में एक दीपक जलाए आज बैठा है…
ना सुनता है किसी की ये, बड़ा मग़रूर आशिक़ है,
तेरी चौखट पे सर अपना झुकाए आज बैठा है…
– प्रतीक दास

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