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अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ

अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ

कन्धों को बोझ तले दबाए जा रही हूँ
अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ

तुम्हारी ख्वाहिशों को तवज्जो देते देते
खुद के अरमानों को दफ़नाए जा रही हूँ

ज़िन्दगी के ग़मों का हिसाब करते करते
सारी खुशियाँ भी उधार लगाए जा रही हूँ

बहुत लिख चुकी शेरों को कोरे पन्नों पर
अब अपनी ही ग़ज़लों से उकताए जा रही हूँ

फकत यही फ़र्क़ है मेरे जीने और मरने में
इन साँसों की इक रस्म है,निभाए जा रही हूँ

-शाल्वी

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