POETRY

अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ

By November 28, 2017 No Comments

कन्धों को बोझ तले दबाए जा रही हूँ
अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ

तुम्हारी ख्वाहिशों को तवज्जो देते देते
खुद के अरमानों को दफ़नाए जा रही हूँ

ज़िन्दगी के ग़मों का हिसाब करते करते
सारी खुशियाँ भी उधार लगाए जा रही हूँ

बहुत लिख चुकी शेरों को कोरे पन्नों पर
अब अपनी ही ग़ज़लों से उकताए जा रही हूँ

फकत यही फ़र्क़ है मेरे जीने और मरने में
इन साँसों की इक रस्म है,निभाए जा रही हूँ

-शाल्वी

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