Author: निवेदिता

शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती

तुम उपस्थित हो मेरे ठीक सामने देख पा रही हूं तुम्हारे होठों का हिलना शब्द कानों तक नहीं पहुंच रहे मेरी गर्दन पर आकर बैठ गई है अकेलेपन की महसूसियत जो अब भीतर उतरती जाती है वह मेरे साथ अधिक है तुम से भी अधिक दुख के लम्बे क्षणों के अन्तराल में वह ठिठक कर आता रहा है मेरे समीप और अब मेरे निकट यूं रहना उसका स्वभाव हो चला है एक बुरा – सा स्वभाव मैं देख सकती हूं तुम्हारे चेहरे की परिचित बनावट शक्ल क...