Author: पल्लवी त्रिवेदी

हर पहर प्रेम

(श्रवण ) आज सवेरे जब तुम्हे देख रही थी अपलक , परिंदों को दाना डालते हुए , छत पर दो गौरैया , तीन कबूतर और चार गिलहरियों से घिरे , उन्हें प्यार से टेर लगाकर बुलाते हुए तुम,   अचानक एक गहरी और शांत आवाज़ में तब्दील हो गए थे और मैं लगभग ध्यान मग्न संसार के सारे स्वर मौन हुए और तुम गूंजने लगे मेरे देह और मन के ब्रम्हांड में एक नाद की तरह काटते रहे चक्कर मेरी नाभि के इर्द गिर्द मैं उस पल में एक योगि...