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शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती

तुम उपस्थित हो मेरे ठीक सामने देख पा रही हूं तुम्हारे होठों का हिलना शब्द कानों तक नहीं पहुंच रहे मेरी गर्दन पर आकर बैठ गई है अकेलेपन की महसूसियत जो अब भीतर उतरती जाती है वह मेरे साथ अधिक है तुम से भी अधिक दुख के लम्बे क्षणों के अन्तराल में वह ठिठक कर आता रहा है मेरे समीप और अब मेरे निकट यूं रहना उसका स्वभाव हो चला है एक बुरा – सा स्वभाव मैं देख सकती हूं तुम्हारे चेहरे की परिचित बनावट शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती हम एक अजीब समय खण्ड में आ पहुचे हैं जहां एक दूसरे को पहचानना भूलता जाता है बीच के किसी रिक्त बिन्दु पर जगह पाकर पसर गया है अकेलापन जरा देर के लिए गौर से सुनो तुम उसे सुन सकते हो मेरे मौन में!

चाँद का नीला रिबन गुम है…

पसीने में पिघलते पस्त दिन की सब थकन गुम है मचलती शाम क्या आयी, है गुम धरती, गगन गुम है भला कैसे नहीं पड़ते हवा की पीठ पर छाले पहाड़ों से चुहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम है कुहासा हाय कैसा ये उतर आया है साहिल पर सजीले-से, छबीले-से समन्दर का बदन गुम है खुली छाती से सूरज की बरसती आग है, लेकिन सिलेगा कौन उसकी शर्ट का जो इक बटन गुम है उछलती कूदती अल्हड़ नदी की देखकर सूरत किनारों पर बुढ़ाती रेत की हर इक शिकन गुम है भगोड़े हो गए पत्ते सभी जाड़े से पहले ही धुने सर अब चिनार अपना कि उसका तो फ़िरन गुम है ज़रा जब धूप ने की गुदगुदी मौसम के तलवों पर जगी फिर खिलखिलाकर सुब्ह, सर्दी की छुअन गुम है गौतम राजऋषि

अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ

कन्धों को बोझ तले दबाए जा रही हूँ अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ तुम्हारी ख्वाहिशों को तवज्जो देते देते खुद के अरमानों को दफ़नाए जा रही हूँ ज़िन्दगी के ग़मों का हिसाब करते करते सारी खुशियाँ भी उधार लगाए जा रही हूँ बहुत लिख चुकी शेरों को कोरे पन्नों पर अब अपनी ही ग़ज़लों से उकताए जा रही हूँ फकत यही फ़र्क़ है मेरे जीने और मरने में इन साँसों की इक रस्म है,निभाए जा रही हूँ -शाल्वी

तुम बस बैठी रहना

तुम बस बैठी रहना, बिल्कुल ऐसे ही, बस बैठी रहना, मैं तुम्हारी आँखों में देखूंगा, तुम्हारी आँखों में अपनी हँसी देखूंगा, तुम मेरी आँखों में तुम्हारी खुशी देखना, तुम बस बैठी रहना, बिल्कुल ऐसे ही, बस बैठी रहना। . मैं तुम्हारी आँखों में उस डूबते हुए सूरज का प्रतिबिम्ब देखूंगा, कुछ देर तुम्हारी आँखों में उस सूरज की लालिमा देखूंगा, तब तक तुम मेरी आँखों में देखना, तुम मेरी आँखों में वो ढलती हुई शाम देखना, तुम मेरी आँखों में उस शाम में उड़ते हुए उस पंछी को पंख फैलाते देखना, बस तुम बैठी रहना, बिल्कुल ऐसे ही, बस बैठी रहना। . तुम मेरी आँखों में वो दरिया देखना, मैं तुम्हारी आँखों में वो नौका देखूंगा, तुम उस नौका में बस मुझे और खुदको पाना, मैं तुम्हारी आँखों में बैठकर वो दरिया पार कर लूंगा, मैं तुम्हारी आँखों में वो खुशी देखूँगा, जिसे अक्सर लोग ढूंढा करते हैं, तुम मेरी आँखों में हमें उन खुशी के पलों को मह...

मौन में बात

आवाज़ों में से संवाद चुराकर कह देना अपना मौन चुप्पी का एकालाप मत बुनना मेरे लिए मौन की अपनी एक भाषा है दो दिलों के बीच में जब निःशब्द होता है तब प्रेम होता है मौन पक्षियों की देह और फरों के बीच जब दबा होता है तब उड़ान होता है मौन भीतर से ही, दबे हुए.. आकाश छू लेने का सपना देख लेता है जब मैं नज़रे उठता हूँ आसमान की ओर तब रंगीन बादल होता है मौन जब तुम मुझे सुनना चाहो तो मेरे मौन को सुन लेना अक़्सर मेरी आवाज़ होता है मौन – धर्मेन्द्र अहिरवार PC – Creative Commons Zero (CC0) license.

सताने को मुझे कुछ इस कदर बेताब है ये दिल

सताने को मुझे कुछ इस कदर बेताब है ये दिल, निगाहें उनकी चिलमन पर लगाए आज बैठा है… उम्मीदों के परों पे आसमान में उड़ रहा पंछी, तेरी राहों पे वो पलकें बिछाये आज बैठा है… उसी के तीर हैं दिल पर, वही हमदर्द है मेरा, कि ज़ख्मों पर मेरे मरहम लगाए आज बैठा है… मोहब्बत क्या है, मेरे दिल से ये ना पूछो, कि सूने घर में एक दीपक जलाए आज बैठा है… ना सुनता है किसी की ये, बड़ा मग़रूर आशिक़ है, तेरी चौखट पे सर अपना झुकाए आज बैठा है… – प्रतीक दास

सूर्यास्त का रंगमंच

कभी देखा है तुमने भारत भवन के पीछे का सूर्यास्त! दिन भर की आपाधापी के अंत के साथ होती है एक नैसर्गिक नाट्य प्रस्तुति की शुरुआत। जिसकी प्रकाश परिकल्पना है चाँद की, और संचालन शाम ने संभाला है। झील में प्रवाहित लहरों ने दिया है जिसका कर्णप्रिय संगीत। गायन वृंद को अपने मधुर कलरव से सजाया है पक्षियों ने। नृत्य संरचना पेड़ों की है, और संचालन किया है हवाओं ने। मंच सज्जा चमकीले सितारों की है, व्यवस्थापन पहाड़ियों का है। वेशभूषा आकल्पन, व निर्माण किया है वर्तमान ऋतु ने। ध्वनि संचालन पल पल परिवर्तित समय का है। झील, तैरती नावों और एक टापू ने किया है जीवंत अभिनय। नाट्यांतर, लेखन व निर्देशन प्रकृति का किया हुआ है। यह नाट्य प्रस्तुति एक संपूर्ण ईश्वरीय आयोजन है, जिसके साक्षी बने हैं हम बहिर्रंग की सीढ़ियों पर बैठ। मन में बजती हैं ऐसी प्रस्तुति पर तालियाँ, और हृदय से आभार और वाह वाह के स्वर उभरते हैं। #र...

हर पहर प्रेम

(श्रवण ) आज सवेरे जब तुम्हे देख रही थी अपलक , परिंदों को दाना डालते हुए , छत पर दो गौरैया , तीन कबूतर और चार गिलहरियों से घिरे , उन्हें प्यार से टेर लगाकर बुलाते हुए तुम,   अचानक एक गहरी और शांत आवाज़ में तब्दील हो गए थे और मैं लगभग ध्यान मग्न संसार के सारे स्वर मौन हुए और तुम गूंजने लगे मेरे देह और मन के ब्रम्हांड में एक नाद की तरह काटते रहे चक्कर मेरी नाभि के इर्द गिर्द मैं उस पल में एक योगिनी थी और तुम ओम… ओम…ओम ………………………………………………………………. ( स्वाद) आज दोपहर मौसम की पहली बारिश और बस … तुमने देखा मुझे ऐसी तलब भरी निगाहों से मानो मैं चाय की एक प्याली हूँ ओह …उत्तेजना से थरथरायी प्याली और टूट कर बिखर गयी एक गर्म आगोश में और...

प्यार को प्यार ही रहने दो.. कोई नाम ना दो…

उसका ये कहना कि गुलज़ार ने जो लिखा है उसके बाद प्यार का डेफिनेशन ही ख़त्म हो जाता है.. मुझे ठीक तभी याद आता है खामोशी का वो गीत.. हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू..  वो कहती है.. तुम खुद ही देखो ना.. क्या खूब कहा है.. सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो.. प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो.. सच है इस के बाद प्यार को कोई और क्या कहेगा.. इश्क में डूबा हुआ इंसान माशूक से ज्यादा गानों से प्यार करता है.. गोया संगीत के बिना मोहब्बत अधूरी है.. वो कहती है और नहीं तो क्या वैसे भी आधे शायर आशिक ही होते है..  और बाकी के? ये मैं पूछता हूँ.. माशूक…! !  वो हँसते हुए उठती है और अपनी लम्बी सी चोटी को इस काँधे से उठाकर उस काँधे पर रखती है. मेरी आँखे उसके बालो में बंधे गुलाबी रिबिन पर रुक जाती है.. ऐसे ही गुलाबी गाल हो जाते है उसके.. जब वो बहुत रोती है या फिर खिलखिलाके हँस देती है.. अब चलते हुए...

पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..

पतले चक्कों वाली सायकिल पर पैंडल मारते मारते शहर के दुसरे कोने में आ गए.. अब बस्ते रख दिए है पेड़ से सटाकर.. और मोजो को जूतों में खिसका दिया है.. कोहनी का तकिया बनाकर. लेट गए है मिट्टी में और देखते हुए आसमान में मुस्कुराकर कहते है.. कि साला पी टी आई जो पकड़ लेता तो धुनाई बहुत होती.. कुछ देर सुस्ताकर खोलते है टिफिन मेथी के परांठो की खुशबू लुटा देते है आसमानों में.. अब एक टांग पे टांग टिकाये गिनते है अंटी के सिक्को को.. और खरीद के पतंग चाँद तारो वाली बस्ते से चरखी.. निकाल लेते है.. लम्बी तान पतंग को देके.. बस ऊपर ही तकते है.. कट जायेगी जब दस पांच पतंगे.. झाड के पैंट को अपनी.. बस्ते में चरखी धर लेंगे.. सायकिल पे रख के बस्ता अपना फिर से घर को चल लेंगे.. जो कहते है ऐसा हाल रहा तो आगे जाकर क्या करोगे? उनकी हमको फ़िक्र नहीं आफ्टर आल अभी पिछले सन्डे ही तो पहला पिम्पल फूटा है..

Facebook group helps people in Hawaii find their stolen phone

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