करता हूँ जब भी हबीब से बातें,
वो करती है रक़ीब की बातें!
हाँ!उससे अक्सर बातें होती हैं
मुख़्तसर मुलाक़ातें होती हैं,
कभी उसकी बातों से फूल झड़ते है,
तो कभी उसकी आँखों से ग़म की धूल उड़ती हैं,
कभी बातों बातों में हँस देती है,
तो कभी रोती देती है,
पर आँखे मेरी नम कर देती है।
कभी अपने पेशानी पे शिकन,
तो कभी चली आती है वो,
होठों पर मुस्कान का श्रृंगार लिए।
हाँ! उससे बातें करना अच्छा लगता है,
उसका हर झूठ भी मुझको सच्चा लगता है,
गिला है उसको,अपने इस नसीब का,
होती है साथ मेरे,
पर नाम हरदम होठों पर रक़ीब का,
मैं भी तसल्ली से उसकी बातों के मोती चुन लेता हूँ,
मेरे मतलब की हो!या न हो,
उसकी हर बात सुन लेता हूँ।
हर बात में एक ही ज़िक्र करती है,
वो हरदम उसका फ़िक्र करती है।
उससे उसको शिकवे हज़ार हैं,
पर कहती है “मुझे उससे प्यार है”!,
इसलिए उसकी परवाह करती हूँ,
वो चाहे न चाहे,मैं उसकी चाह रखती हूँ,
वो सितम लाख ढाये,
सब हँस के सहती है।
कहाँ, क्या बात हुई है?
सारी बातें मुझसे कहती है।
दिन गुज़रे कैसे उसके संग,
कैसे गुज़री उससे रूठकर रातें,
करता हूँ जब भी हबीब से बातें,
वो करती है रक़ीब की बातें!

“शैल”

Leave a Reply