किताबों से झगड़ कर,
मैं खिड़कियों के बाहर झांकती हूँ,
मैं रोज़ किसी ना किसी बहाने,
तुम्हारी राह ताकती हूँ।

इन पेड़ों की डालियों पर बैठे,
पंछियों से तुम्हारे हाल जानती हूँ,
मैं रोज़ आते जाते लोगों में,
तुम्हारी झलक पाती हूँ।

यार दोस्तों से बातों में भी,
अब तुम्हारी खैरियत और अंदाज़ की बातें होती हैं,
मैं जाने-अनजाने में ही सही,
तुम्हारी हर बात उन्हें बताती हूँ।

मेरी कविताओं कहानियों में अब,
सिर्फ तुम्हारा ही किरदार होता है,
मुझे और कुछ सूझता ही नहीं,
इसीलिए तुम्हें ही लिख पाती हूँ।

तुम्हें बेवक्त ढूंढने के लिए,
ना जाने कितनी किताबें पढ़ जाती हूँ,
मैं तुम्हारी याद आने पर
तुम्हें अपने सिरहाने देखना चाहती हूँ।

मैं सपनों में तुम्हें पुकार कर
घंटो बतियाती हूँ,
मैं समझती ही नहीं असलियत को,
बस ख्वाबों में ही रहना चाहती हूँ।

आँखों में सिर्फ,
तुम्हारा ही साया बसा है मेरे,
शायद इसीलिए हर शख़्स में,
मैं तुम्हारी शख्सियत आंकती हूँ।

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