ghazal

आप की याद आती रही रात भर

आप की याद आती रही रात भर चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर गाह जलती हुई गाह बुझती हुई शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन कोई तस्वीर गाती रही रात भर फिर सबा साया-ए-शाख़-ए-गुल के तले कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर जो न आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर हर सदा पर बुलाती रही रात भर एक उम्मीद से दिल बहलता रहा इक तमन्ना सताती रही रात भर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को

शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को सियाह रात ने बेहाल कर दिया मुझ को कि तूल दे नहीं पाया किसी कहानी को बजाए मेरे किसी और का तक़र्रुर हो क़ुबूल जो करे ख़्वाबों की पासबानी को अमाँ की जा मुझे ऐ शहर तू ने दी तो है भुला न पाऊँगा सहरा की बे-करानी को जो चाहता है कि इक़बाल हो सिवा तेरा तो सब में बाँट बराबर से शादमानी को – शहरयार (अख़लाक़ मोहम्मद ख़ान)

चाँद का नीला रिबन गुम है…

पसीने में पिघलते पस्त दिन की सब थकन गुम है मचलती शाम क्या आयी, है गुम धरती, गगन गुम है भला कैसे नहीं पड़ते हवा की पीठ पर छाले पहाड़ों से चुहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम है कुहासा हाय कैसा ये उतर आया है साहिल पर सजीले-से, छबीले-से समन्दर का बदन गुम है खुली छाती से सूरज की बरसती आग है, लेकिन सिलेगा कौन उसकी शर्ट का जो इक बटन गुम है उछलती कूदती अल्हड़ नदी की देखकर सूरत किनारों पर बुढ़ाती रेत की हर इक शिकन गुम है भगोड़े हो गए पत्ते सभी जाड़े से पहले ही धुने सर अब चिनार अपना कि उसका तो फ़िरन गुम है ज़रा जब धूप ने की गुदगुदी मौसम के तलवों पर जगी फिर खिलखिलाकर सुब्ह, सर्दी की छुअन गुम है गौतम राजऋषि

अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ

कन्धों को बोझ तले दबाए जा रही हूँ अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ तुम्हारी ख्वाहिशों को तवज्जो देते देते खुद के अरमानों को दफ़नाए जा रही हूँ ज़िन्दगी के ग़मों का हिसाब करते करते सारी खुशियाँ भी उधार लगाए जा रही हूँ बहुत लिख चुकी शेरों को कोरे पन्नों पर अब अपनी ही ग़ज़लों से उकताए जा रही हूँ फकत यही फ़र्क़ है मेरे जीने और मरने में इन साँसों की इक रस्म है,निभाए जा रही हूँ -शाल्वी

सताने को मुझे कुछ इस कदर बेताब है ये दिल

सताने को मुझे कुछ इस कदर बेताब है ये दिल, निगाहें उनकी चिलमन पर लगाए आज बैठा है… उम्मीदों के परों पे आसमान में उड़ रहा पंछी, तेरी राहों पे वो पलकें बिछाये आज बैठा है… उसी के तीर हैं दिल पर, वही हमदर्द है मेरा, कि ज़ख्मों पर मेरे मरहम लगाए आज बैठा है… मोहब्बत क्या है, मेरे दिल से ये ना पूछो, कि सूने घर में एक दीपक जलाए आज बैठा है… ना सुनता है किसी की ये, बड़ा मग़रूर आशिक़ है, तेरी चौखट पे सर अपना झुकाए आज बैठा है… – प्रतीक दास