ghazal

चाँद का नीला रिबन गुम है…

पसीने में पिघलते पस्त दिन की सब थकन गुम है मचलती शाम क्या आयी, है गुम धरती, गगन गुम है भला कैसे नहीं पड़ते हवा की पीठ पर छाले पहाड़ों से चुहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम है कुहासा हाय कैसा ये उतर आया है साहिल पर सजीले-से, छबीले-से समन्दर का बदन गुम है खुली छाती से सूरज की बरसती आग है, लेकिन सिलेगा कौन उसकी शर्ट का जो इक बटन गुम है उछलती कूदती अल्हड़ नदी की देखकर सूरत किनारों पर बुढ़ाती रेत की हर इक शिकन गुम है भगोड़े हो गए पत्ते सभी जाड़े से पहले ही धुने सर अब चिनार अपना कि उसका तो फ़िरन गुम है ज़रा जब धूप ने की गुदगुदी मौसम के तलवों पर जगी फिर खिलखिलाकर सुब्ह, सर्दी की छुअन गुम है गौतम राजऋषि

अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ

कन्धों को बोझ तले दबाए जा रही हूँ अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ तुम्हारी ख्वाहिशों को तवज्जो देते देते खुद के अरमानों को दफ़नाए जा रही हूँ ज़िन्दगी के ग़मों का हिसाब करते करते सारी खुशियाँ भी उधार लगाए जा रही हूँ बहुत लिख चुकी शेरों को कोरे पन्नों पर अब अपनी ही ग़ज़लों से उकताए जा रही हूँ फकत यही फ़र्क़ है मेरे जीने और मरने में इन साँसों की इक रस्म है,निभाए जा रही हूँ -शाल्वी

सताने को मुझे कुछ इस कदर बेताब है ये दिल

सताने को मुझे कुछ इस कदर बेताब है ये दिल, निगाहें उनकी चिलमन पर लगाए आज बैठा है… उम्मीदों के परों पे आसमान में उड़ रहा पंछी, तेरी राहों पे वो पलकें बिछाये आज बैठा है… उसी के तीर हैं दिल पर, वही हमदर्द है मेरा, कि ज़ख्मों पर मेरे मरहम लगाए आज बैठा है… मोहब्बत क्या है, मेरे दिल से ये ना पूछो, कि सूने घर में एक दीपक जलाए आज बैठा है… ना सुनता है किसी की ये, बड़ा मग़रूर आशिक़ है, तेरी चौखट पे सर अपना झुकाए आज बैठा है… – प्रतीक दास