kavita

अनुराग तिवारी की कविता “कविताएँ”

अनुराग तिवारी की कविता “कविताएँ” कविताएँ बेपैर चलती हैं और तय करती हैं हज़ारों मीलों की यात्रा बेपंख उड़ती हैं सात समुन्दर पार किसी प्रवासी पक्षी की तरह पढ़ने वालों का बनाया अनुकूल आश्रय और उनके मौजूँ होने का मौसम उन्हें खींचता है अनुवादक कविता के परदेसी प्रेमी उनकी भाषा की पुडिया अपनी भाषा में खोलकर बग़ैर वीज़ा पासपोर्ट के उन्हें अपना देश घुमाते हैं हर कविता एक बहुत बड़े पचरंगे स्वप्निल तार का हिस्सा जिससे बाँधा जाएगा हर पल बिखरती विभजती झगड़ती ख़तरे के निशान तक डूबी दुनिया को एक दिन रक्षा सूत्र और प्रेम सूत्र बाँधने की तरह।

शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती

तुम उपस्थित हो मेरे ठीक सामने देख पा रही हूं तुम्हारे होठों का हिलना शब्द कानों तक नहीं पहुंच रहे मेरी गर्दन पर आकर बैठ गई है अकेलेपन की महसूसियत जो अब भीतर उतरती जाती है वह मेरे साथ अधिक है तुम से भी अधिक दुख के लम्बे क्षणों के अन्तराल में वह ठिठक कर आता रहा है मेरे समीप और अब मेरे निकट यूं रहना उसका स्वभाव हो चला है एक बुरा – सा स्वभाव मैं देख सकती हूं तुम्हारे चेहरे की परिचित बनावट शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती हम एक अजीब समय खण्ड में आ पहुचे हैं जहां एक दूसरे को पहचानना भूलता जाता है बीच के किसी रिक्त बिन्दु पर जगह पाकर पसर गया है अकेलापन जरा देर के लिए गौर से सुनो तुम उसे सुन सकते हो मेरे मौन में!