mic and manch

चाँद का नीला रिबन गुम है…

पसीने में पिघलते पस्त दिन की सब थकन गुम है मचलती शाम क्या आयी, है गुम धरती, गगन गुम है भला कैसे नहीं पड़ते हवा की पीठ पर छाले पहाड़ों से चुहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम है कुहासा हाय कैसा ये उतर आया है साहिल पर सजीले-से, छबीले-से समन्दर का बदन गुम है खुली छाती से सूरज की बरसती आग है, लेकिन सिलेगा कौन उसकी शर्ट का जो इक बटन गुम है उछलती कूदती अल्हड़ नदी की देखकर सूरत किनारों पर बुढ़ाती रेत की हर इक शिकन गुम है भगोड़े हो गए पत्ते सभी जाड़े से पहले ही धुने सर अब चिनार अपना कि उसका तो फ़िरन गुम है ज़रा जब धूप ने की गुदगुदी मौसम के तलवों पर जगी फिर खिलखिलाकर सुब्ह, सर्दी की छुअन गुम है गौतम राजऋषि

Mic & Manch – Jugalbandi

After 3 Successful events in Bhopal. This time “Mic & Manch” brings for you a deadly “Jugalbandi Night”. Where you can show your talent with your partner in any art form like Music, Poetry, Comedy, Storytelling or more. Registration will close on 10 Dec 2017, so don’t waste the time and click on the link below : http://micandmanch.com/registration-jugalbandi/ Jugalbandi (literally “tied together”), is an ancient Indian art form where two person with different styles perform together. Lately, it has been popularized to mean different forms of music, dance and other art forms coming together in a impromptu fusion, catering to all the senses simultaneously – a perfect example where art has no boundaries!  

Swar-Raag

  The rules: Participants must perform only their own writing/contents. Only solo or duo performances; no groups please. You get the use of a microphone. No other arrangements will be made for your performance. Genres: No restriction. Poetry, monologues, stories, music (original/classical/folk/ghazals), it’s all good. Prohibited: Foul language, explicit sexual imagery, slander, anything that flouts the laws of India. If you want a slot: You must be physically present at the venue 30 minutes before start time. You must show the text/content of what you plan to perform to the organizers present, and describe your performance. This is not about censorship; it is to guard against infringement of the rules. There are no prizes, except the opportunity to perform to an audience, and ea...

अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ

कन्धों को बोझ तले दबाए जा रही हूँ अपना जनाज़ा खुद उठाए जा रही हूँ तुम्हारी ख्वाहिशों को तवज्जो देते देते खुद के अरमानों को दफ़नाए जा रही हूँ ज़िन्दगी के ग़मों का हिसाब करते करते सारी खुशियाँ भी उधार लगाए जा रही हूँ बहुत लिख चुकी शेरों को कोरे पन्नों पर अब अपनी ही ग़ज़लों से उकताए जा रही हूँ फकत यही फ़र्क़ है मेरे जीने और मरने में इन साँसों की इक रस्म है,निभाए जा रही हूँ -शाल्वी

तुम बस बैठी रहना

तुम बस बैठी रहना, बिल्कुल ऐसे ही, बस बैठी रहना, मैं तुम्हारी आँखों में देखूंगा, तुम्हारी आँखों में अपनी हँसी देखूंगा, तुम मेरी आँखों में तुम्हारी खुशी देखना, तुम बस बैठी रहना, बिल्कुल ऐसे ही, बस बैठी रहना। . मैं तुम्हारी आँखों में उस डूबते हुए सूरज का प्रतिबिम्ब देखूंगा, कुछ देर तुम्हारी आँखों में उस सूरज की लालिमा देखूंगा, तब तक तुम मेरी आँखों में देखना, तुम मेरी आँखों में वो ढलती हुई शाम देखना, तुम मेरी आँखों में उस शाम में उड़ते हुए उस पंछी को पंख फैलाते देखना, बस तुम बैठी रहना, बिल्कुल ऐसे ही, बस बैठी रहना। . तुम मेरी आँखों में वो दरिया देखना, मैं तुम्हारी आँखों में वो नौका देखूंगा, तुम उस नौका में बस मुझे और खुदको पाना, मैं तुम्हारी आँखों में बैठकर वो दरिया पार कर लूंगा, मैं तुम्हारी आँखों में वो खुशी देखूँगा, जिसे अक्सर लोग ढूंढा करते हैं, तुम मेरी आँखों में हमें उन खुशी के पलों को मह...