shayari

शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को

शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को सियाह रात ने बेहाल कर दिया मुझ को कि तूल दे नहीं पाया किसी कहानी को बजाए मेरे किसी और का तक़र्रुर हो क़ुबूल जो करे ख़्वाबों की पासबानी को अमाँ की जा मुझे ऐ शहर तू ने दी तो है भुला न पाऊँगा सहरा की बे-करानी को जो चाहता है कि इक़बाल हो सिवा तेरा तो सब में बाँट बराबर से शादमानी को – शहरयार (अख़लाक़ मोहम्मद ख़ान)

तुम बस बैठी रहना

तुम बस बैठी रहना, बिल्कुल ऐसे ही, बस बैठी रहना, मैं तुम्हारी आँखों में देखूंगा, तुम्हारी आँखों में अपनी हँसी देखूंगा, तुम मेरी आँखों में तुम्हारी खुशी देखना, तुम बस बैठी रहना, बिल्कुल ऐसे ही, बस बैठी रहना। . मैं तुम्हारी आँखों में उस डूबते हुए सूरज का प्रतिबिम्ब देखूंगा, कुछ देर तुम्हारी आँखों में उस सूरज की लालिमा देखूंगा, तब तक तुम मेरी आँखों में देखना, तुम मेरी आँखों में वो ढलती हुई शाम देखना, तुम मेरी आँखों में उस शाम में उड़ते हुए उस पंछी को पंख फैलाते देखना, बस तुम बैठी रहना, बिल्कुल ऐसे ही, बस बैठी रहना। . तुम मेरी आँखों में वो दरिया देखना, मैं तुम्हारी आँखों में वो नौका देखूंगा, तुम उस नौका में बस मुझे और खुदको पाना, मैं तुम्हारी आँखों में बैठकर वो दरिया पार कर लूंगा, मैं तुम्हारी आँखों में वो खुशी देखूँगा, जिसे अक्सर लोग ढूंढा करते हैं, तुम मेरी आँखों में हमें उन खुशी के पलों को मह...