हाँ! आज भी मेरी रगों में
तुम्हारे इश्क़ का लहू बहता है।
आज भी मुहब्बत वही है,
चीख चीख कर कहता है,
आज भी खून से लिखे उन ख़तों का रंग फ़ीका नहीं हुआ।
बिलकुल मेरी चाहत की तरह,
आज भी उनमें वही चमक है,
उन पन्नों पर लिखा हर हर्फ़,
मेरी उल्फ़त की गवाही दे रहा हो जैसे।
सुना है विज्ञान बताता है,
हमारी नसों में दो तरह के लहू बहते हैं,
एक शिरा और एक धमनियों से!
लेकिन मेरी रगों न तो ये फर्क़ भी महसूस नही किया,
जितनी बार ख़त लिखने को,
नसों में सुई चुभोई,
रंग एक ही निकला,
तुम्हारी मुहब्बत का,
तुम्हारी यादों का,
हाँ! ये भी सुना है कि,
लहू के तीन हिस्से होते हैं,
एक अंश लाल,
एक सफ़ेद,
एक पीला, जिसे प्लेटलेट कहते हैं,
सही ही कहा है,
अगर मैं भी अपने जिश्म से निचोड़कर अगर कोई कहानी लिखने बैठूँ तो,
तीन किरदार निकलेंगे मेरे लहू के,
वो जो लाल वाला हिस्सा है न!
उससे मैं वो सारे ख़ुशनुमा पल लिख़ सकता हूँ,
जो तुम्हारे साथ बिताए,
तुम्हे प्यार करते हुए,
उन पलों में हमारा रिश्ता भी ख़ूब चटकदार था,इस लाल वाले हिस्से की तरह।
उसके बाद अगर सफेद वाला हिस्सा उठाकर एक किस्सा लिखूँ तो,
वो सारे पल लिख सकता हूँ,
जो हिज़्र में काटें मैंने,
बिलकुल बेरंग,नीरस,किसी निर्जीव देह के जैसा।
लेकिन विज्ञान कहता है,
ये सफेद वाला रक्त का हिस्सा,
इंसान के सबसे ज्यादा काम आता है,
शरीर का हर घाव भरने से लेकर,
उसकी ऊर्ज़ा को बनाये रखने में,
हर विषम परिस्थितियों में ये शरीर को ताकत देता है,
मेरे साथ भी यही हुआ,
लाल रंग का लहू तो जैसे एक छलावा था,
काम तो मेरे भी सफ़ेद वाला ही आया,
तुमसे बिछड़कर जो भी अनुभव लिया,
वो जीवन भर काम आने वाला है,
ज़िन्दगी के इस सफेद वाले हिस्से में ही,
मैंने असली रंग देखे,चाहे वो तुम्हारा हो या उनका जो मुझे अपना कहते थे।
अब बात करते हैं पीले वाले हिस्से की,
ये होता तो ज़रूरी है पर लोग इसकी कीमत तब समझते हैं,
जब वो बिलकुल कमज़ोर हो चुके होते हैं,
कभी कभी तो इसकी कमी जानते जानते मौत ही आ जाती है,
और अगर मैं इस हिस्से की बात करूँ तो ये मैं हूँ,
जी हाँ, मैं ख़ुद,
लोगों को और तुमको ख़ुश करने में,
मैं तो अपनी ही क़ीमत भूल चुका था,
आज़ जब मैं टूट चुका हूँ,
और खुद को कमज़ोर महसूस कर रहा हूँ तो याद आया ,
मैंने तो सबसे ज़्यादा अपना ही दिल दुखाया है,
लोग तो आते हैं, जाते हैं,
जैसे सबका एक क़िरदार उस रब ने तय किया हो,!
अपना किरदार निभाया और किस्सा खत्म,
वो तो हम है जो उन के संग और उनकी यादों के संग चिपके रहते हैं,
और अपनी ही बुनियाद को खोखला करते रहते हैं!
जैसे दीमक लकड़ी को चाट खाता है,
वैसे ही हम अपने इस देह को धीरे धीरे गलाते रहते हैं।

अरे ये क्या मैं तो किसी दार्शनिक जैसी बातें करने लगा।

मैं अपने आप को कितना भी समझा लूँ,
चाहे लाख बहला फुसला लूँ,
इस बात को नकार नही सकता,

हाँ! आज भी मेरी रगों में
तुम्हारे इश्क़ का लहू बहता है।

सालों बाद जून की कोई गर्म दुपहरी उसी नीम के नीचे कोई ख़याल कागज़ पर उतरा और सिलसिला चल पड़ा…..फिर कभी इंडियन कॉफी हाउस के पेपर नेपकीन पर तो कभी केमिस्ट्री की फाइल में जमा होते गए लमहे … मटका कुल्फी वाली गर्मियों की रातें, आँगन में अलाव सेंकती सुबहें और छज्जे से टपकता सलेटी दिन… यूकेलिप्टस वाले मकान का वो मोड़ भी जहाँ से यादें लिफ्ट ले लेती हैं…कंदील से बतियाता चाँद ,गिफ्ट वाला कड़ा, तकिया टापू की मन्नतें और पटेल ग्राउंड पर लेग बिफोर होता बचपन….. गले गले भर गया गुल्लक तो सोचा तुड़वा लें ऍफ़ डी… खोलकर देखा तो ज़िन्दगी `बारह आने की पड़ीं….अठन्नी में चवन्नी ज़्यादा और रुपये में चवन्नी कम….

– सुधीर शर्मा

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