ये हाल था हम अपनी ही नज़रों से गिर गए
दौलत की जद्दोजहद में रिश्ते बिखर गए

फ़िर आ गया तक्कलुफ उनसे कलाम में
रिश्ता वही रहा मग़र एहसास मर गए

खुद से तवक़्क़ोहात ख़तम हो गयी मेरी
जब आईना दिख तो खुद से ही डर गए

जिन मंज़िलों पे होता है ख़ुद्दारियों का क़त्ल
अफ़सोस हम वहाँ से कब के गुज़र गए

तन्हा जो मैं किनारे पे पहुँचा तो ये लगा
हम ज़िन्दगी जीने की हाजत में मर गए

रुसवा किया अज़ीज़ों को गैरों को मानकर
हम ऐसी गलतियाँ भी हयाती में कर गए

ताजिर थे मग़र इतनी तिज़ारत ना कर सके
इतना नफ़ा हुआ के नुक़सान कर गए

अब ज़िन्दगी के फ़लसफ़े आने लगे समझ
जो ग़लतियों से सीख गए वो सँवर गए ।।

शाह हुसैन

शाह हुसैन

मैं वो मिसाल हूँ जिसकी कोई मिसाल नहीं, कमाल ये है की मुझमें कोई कमाल नहीं।

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